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  • Prabandhak: "शेरदा अनपढ़" जी.. कविवर बौड़िक ऐन..  आखिर! आप कविवर, यीं धरती सी दूर, चलिग्यन, कुजाणि कख, कालजयी, कुमाऊनी कविताओं कू, सृजन करिक, अनंत की ओर.....  हमारा प्रिय स्वर्गवासी, जनकवि "गिर्दा" जी तैं, धरती का हाल बतैन, ऊँका चाण वाळौं की, विरह मा व्यथित, मन की बात बतैन, ह्वै सकु त फिर, "गिर्दा" जी का दगड़ा, नयुं शरीर धारण करिक, उत्तराखंड की धरती मा, कविवर बौड़िक ऐन..
    Today at 02:25:47 PM
  • Prabandhak: प्रख्यात कुमाऊंनी कवि शेर सिंह बिष्ट यानि ’शेरदा अनपढ़’ का रविवार सायं निधन हो गया।  कुछ समय से बीमार चल रहे ७९ वर्षीय शेरदा ने अस्पताल में उपचार के दौरान अन्तिम सांस ली।  तीन अक्टूबर १९३३ को अल्मोड़ा के माल गांव में जन्मे शेरदा वर्तमान में हल्द्वानी की श्याम विहार कॉलोनी मुखानी में रह रहे थे।
    Today at 09:46:48 AM
  • Prabandhak: मान्यवर   बुरांस परिवार की तरफ भटेय सादर सैमन्या अर  सेवा  श्रीमान जी  लोकभाषा (गढ़वली - कुमौनी अर जौनसारी )  की समस्या और समाधान थेय " कौथिग २०१२ " मा  मुंबई का प्रवासी उत्तराखंडी  समाज का बीच एक परिचर्चा का रूप मा ल्याणा की कोशिश मुंबई का बुरांस संगठन कु एक प्रयास ,लोकभाषा का क्षेत्र मा पिछला २५ बरसौं भटेय आंदोलनरत धाद संगठन का  " धाद लोकभाषा एकांश "  की विमर्श श्रंखला  "आखिर कनकै  बचऽलि भाषा " मा हम आप्थेय लोक भाषा प्रेमी और बुद्धिजीवी  का रूप मा आपक वैचारिऽक उपस्थिति का वास्ता  सादर न्यूतणा छौं ,   कार्यक्रम मा आपकू आणु और आप्की भागीदारी थेय बुरांस परिवार अप्डू  सौभाग्य सम्झलू  कार्यक्रम मा आप्की जग्वाल रैली  शुभकामनाओं  दगड आपकू अप्डू गीतेश सिंह नेगी जग्वाल मा :  बुरांस परिवार मुंबई ,धाद लोकभाषा एकांश व कौथिग परिवार मुंबई संपर्क सूत्र : ०८७९१५६११०८,०९६१९००४७९७
    April 23, 2012, 12:44:33 PM
  • Editor Garhwali: Mujib Naithani सेमन्या उत्तराखण्ड..बल ..अगर आपको हाई प्रोफाईल ड्रामा सिखना हो तो कांग्रेस से सीखो ..बल ..केंद्र में आते ही सौ दिन का एजेंडा कई दिन मीडिया में चला ..बल अब तो कई सौ दिन बीत गए पर एजेंडा बल पता नि कख हर्ची गे / वनी एक मंत्री दीदा आते ही हवाई फायर हो गए ये तैयार करो ...वो..बड़ी बड़ी बातें ..बल ..लम्बी लम्बी गप्प ..मुझे स्कूल की दैनिक रिपोर्ट चाहिए ..बल इन लगणु च की मंत्री दीदा पहाड़ी नि छन /बल ..किले...
    April 11, 2012, 02:30:16 PM
  • VINOD GARIYA: "कौ लाटा आण काथा, सुण काला तु , अनाड़िल घट लगाई, दौड़ डुना तु"
    December 26, 2011, 04:29:54 PM
  • Admin: नय्या पीढ़ी आपनी पछाण भुल्या धारा नौला आपना पहाड़ भुल्या  गौं में कि भुल्यु चेलो इसके बतुछ बस द्वी आँखा चार हाड भुल्या  भोट मांगन घर घर डेली उनान सब कॉल करार इन गंज्याढ़ भुल्या  "गुमनाम पिथौरागढ़ी "
    December 25, 2011, 09:49:06 AM
  • Rajesh Joshi: कुमाऊँनी रिस्त... माँ - इजा पापा - बौज्यू भाई - भै बहन - बैणि दादा, नाना - बूबू दादी, नानी - आमा चाचा - कग चाची - काखि ताई - ज्यार्ज पड़ोसी - आमा, बूबू, बोजि या पै नानतिन.. बाकि मैंस तो सब प्लेन्स जै रयीं डबल कमूणे लिजी !
    October 05, 2011, 10:09:20 PM
  • Admin: हुक्का . तमाक , पानी बहुते याद ऊछ नानी रात ठुली कहानी बहुते याद ऊछ  रात्ते,छाकला ,ब्याल जतारान में पीसी रूथी हमारी भूख इजा की परानी बहुते याद ऊछ "गुमनाम "
    August 07, 2011, 04:24:33 PM
  • Rajesh Joshi: बेटे की कहानी बाब की जबानी  आजकल का नोनुं न कमरा माँ लगी देवतो की फोटो पता नि कख फेकली उन फोटो की जगह पर KATRINA की फोटो लगेली. चला मेन सोची में भी देखुलू कण हुंदा इंडर का मेडल ...सिरन्दा तला धरया निर्भागी का दुनिया भर का LOVE LETTER. सब तितरा फतिग्या मेरा पेनो क नि रायु सूरार आर वेते चेणु नयोन क LUX और HAMAM. मेडी वेगी MOM , DAD बाबा. मेंन बोली क्या बुनू मी नी बिन्गाणु मेरु लाटा गीत लगनु एक वू I LOVE YOU, I LOVE YOU में समझी ख़राब होगी होलू डबा हुनो बस्युलू घयु copyright Anju Bartwal ;)
    July 26, 2011, 07:42:57 AM
  • Rajesh Joshi: पहाड़ी ग़ज़ल  जब व्हे खोरि कपास व्हे ग्ये बुडा-बदिन की मजाक व्हे ग्ये  ...ज़माना आग लागो तेरी खोरि ले प्यार ,मुहब्बत ले टाइम पास व्हे ग्ये  देव पित्तर पाथरों ले ढाकी हल्या सारि देवभूमि शराब की दास व्हे ग्ये  बैंड में काँटा लगा इसो चल्यो छोलिया संस्कृति को नास व्हे ग्ये  जब ले जान्छ चेलो परदेश इजा का आँखा चोमास व्हे ग्ये  "गुमनाम पिथोरागढ़ी "
    June 22, 2011, 09:07:18 PM

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Author Topic: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)  (Read 9075 times)  Share 

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #1 on: March 30, 2010, 11:32:17 AM »
उत्तराखण्ड में पंचायत चुनाव का दौर में राजनीतिक स्तराक पतन पर श्री हरीश चन्द्र डोर्बी ज्यू की एक कविता,

ब्लाक प्रमुखोक चुनाव ऐ गैईं
सुकिल टोपि क मुनाव ऐ गैईं
मैंके जितावो-मैके जितावो हैरे
अच्याल हमार गोवु कै बहार ऐरे
गोनु में क्वै पानि ल्याओ नै ल्याओ
सभापति क मुखम पाणि ऐगो
ब्लाक प्रमुखोक चुनाव ऐगो...
एक जै प्रमुख पन्द्रह जै उम्मीदवार है गई
यस लगाण छ जस हमार नेता लै बिरोजगार है गई
जाग-जाग कें मीटिंग हैरे, अपाण-अपाण सेटिंग हैरे
उम्मीदवारो के कि करूं- कि करूं हैरे
तात्ते खूं जल मरूं हैरे........

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #2 on: March 30, 2010, 11:33:41 AM »
पेश छू श्री रतन सिंह किरमोलिया जी की कविता लौटि आओ म्यार गौं

यौ कुड़िक ढुंग, माट्म गार, निरओ उ दिन,
उदिन उणू है पैली, लोटि आओ म्यार गौं।
माठुमाठ कै बिलाणई गौं, मणि-मणि के हराणई मनखी,
बुसिण लारै मन्ख्योव सारी, ह्वैलाण लारै स्वैंण पनपी।
माठुमाट के सिराणी संस्कार, रीति-रिवाज हमार त्यार-बार,
क्यार बाई तलिमलि सारैं-सार, माठुमाट के पुरखों की मिटनै अन्वार।
गोठ पान धौ धिनाई नाज पाणि, सुकनै ऊनौ छ्याव, चुपटान, नौवोक पाणी,
हमरि पितरुं कि आपणि हौत छी जो, आ दुरांकि हौत करि यौ हरै सरग चाणि।
लेखी-जोखी खोई म्वाव, इकद्रि ह्ण छी ठुलि कुडिक,
जैस दारपदार बणी हं छी, घाव दयार और तुणीक।
मणि-मणि कै मेटिणै नौ निसाणि, फुफाणौ अर्याटे-कर्याटे सिसौंण क भूड़,
मौनाक जावांक मौ धौ देखिण ह गो, मौनाक जावां अडारौंल लगै हाली पूड़।
के म्यार पुरखोंक गौंकियस्से छी पछ याण, दूद जुन्यावैकि पुज लागछी थान बार,
पितरौंक बताए बाट जांछी सब्बै, किलै भुलि गेई आपण पर्याय अच्यानचार।
भौव हैं गौंक इतिहास पढ़्न है पैल्ली, गौंक बाट मेटिण हैं पैल्ली,
पुरखोंक पुस्तनाम द्येखण हैं पैल्ली, उ खन्यार कुणौ मि आजी ज्यों नै छों।
यौ कुडि़क ढुंग, माट, गार, नि र ओ उ दिन, उ दिन ऊण हैं पैल्ली,
लौटि आओ म्यार गौं, लोटी आओ, म्यार गौं....................।

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #3 on: March 30, 2010, 11:46:45 AM »
श्री हेमंत जोशी जी, छानी, मासी,चौखुटिया

मेरी इज कांछी च्याला थोडा पढले
ज्यादा नीहे सक्नो ८ पास करले
ठुल हवे भोव द्वि रवट कमाले
आपण नाना दागे हमू काले खवाले
हम द्वी बुड बाडी तयार नाना ग्वाव भेरोल
उनुके देखि बेर हम ले बोती रोल
नकी-भली चीज ल्याले हम ले खौल
त्यर नान छिना क्वीड त्यर नाना के सुणूल
हंसी खुसी नाच गाने बुढापा काटूल...............

मे बुआल सोची सब धरी रेअगोय
स्कुल के छोडोऊ तली एगोय
मे बुवाल बया करो नानतिन ले तली ल्येगोय
दिन म्हणं महेन सालम एकबतीयन्ने राय
बार चाहने २ आँख ले उनर कोच्यारम नहे ग्यय
नक भली चीज पली पली च्याले ल्याई गुड -चान ले हराय
जब ले सड़क मै गाडी रुकी चौथारम ऐ जानी
भीजी आँख लीबे फिर मोहरिम भै जानी
मन मनै एक सवाल पूछनी
जो ले जानी तली च्याला कभे लौट बे ले आनी
या यू पितरों कुड़ी माजी द्वार ढकी लगे जानी
तू कछिये राती पारी भै बेर ब्याव दिल्ली पहुच जानी
तवी बता दिल्ली बे पहाड़ पूजन मे कतू साल लागनी
 


 
 

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #4 on: March 30, 2010, 11:47:42 AM »
डॉक्टर दीपा गोबाड़ी की रचना ईज पर

इजा ! म्यार भूख डाड़ में त्वील निवाल देछ
मील मागो रुवट त्वील पकवान देछी
मील चद्दर मागो, त्वील नरम दिशांण देछ
स्यो; इच्छा मेरी त्वील, बड़ भेर आँचल देछ
म्यर लेखन पड़नक इच्छा, त्वील मीके ज्ञान देछ
एक्क त्वप पाणी इच्छा, त्वील ठुल्लो सागर देछ
जली पीडान घौ म्यार, त्वील ठण्ड मलम देछ
म्यार स्वीनक पाखन के त्वील उडी नहीं आकाश देछ
तवी शक्ति छे, तवी दुर्गा छे, तवी जननी इजा
म्यर सबे पेड के दूर कर भेर, मीके खुशिक नीद देछ
 

 
 

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #5 on: March 30, 2010, 11:49:29 AM »
श्री हेमंत जोशी जी, छानी, मासी,चौखुटिया
 
लौट बे एजाओ आब म्यारा पहाडा
धात लगे लगे बुलानी या गढ़यर गाडा
गाढ़ मे दहौ पदान हैगो आब घर आओ
काफल किल्मौड पाक एबेर खै जाओ
धर नोहों को ठंडो पाणी द्वि घूट पि जाओ
लौटी बे .................................

रूढी का घामा उदेख दिना हिय भरी आणि
आम डाई मुन चली रे पौना सर सर सर बुलानी
द्वि घडी निकल बे टेमा यो मूं बैठ जाओ

लौट बे ....................................
ह्यों का दिना धुपरी घामा बैठी क्विढ़ लगानी
भाँग का लूणा निमुवा सानौ मिली जुली खानी
आग तापने आमे की आहनी,जवाब दी जाओ
लौट बे .........................................

बिनती सुणी लियो मेरी लगे बेर काना
परदेश भूली बेर तुम याँ लगाओ ध्याना
जन्मभूमि तुमारी छो यौ करमभूमि ले एति बनाओ
लौट बे ..............................................

पुरखों कुड़ी उधर बे तली ऐगे ऐ बेर छे जाओ
खेती बाड़ी सब बांजी पड़ गयी ऐ बेर कमै जाओ
स्वर्ग छू यौ देवों की भूमि आपण नानाक यौ समझाओ
लौट बे ऐ जाओ .....................................
धात लगे लगे बुलानी यौ गधयर गाडा I

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #6 on: March 30, 2010, 11:50:34 AM »
'चरित्र..' /तसलीमा नसरीन (कुमांउनी में ) तु चेलि छै

य भली कै याद राखिये ।
तु जब घरकि देली पार करली
लोग त्वेस तिरछि नज़रले देखाल ।
तु जब गली बटी गुजरली ,
लोग त्वेस गालि द्याल,सिट्टी बजाल।
तु जब गली पार करि बेर
मुख्य सड़क में पुजली,
उन त्वे 'चरित्रहीन' कौला ।
अगर तु निर्जीव छै त
लौटि पड़्ली, नति
जसी जांछी ,जानी रौली...!


Posted by Deepak Tiruwa
Sourece:http://bedu-pako.blogspot.com/2009/03/blog-post_26.html
« Last Edit: April 29, 2010, 09:58:29 PM by Admin »

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #7 on: March 30, 2010, 11:51:23 AM »
पहाड़ उठूण इतुक सितुल न्हातिन रे।
बहादुर बोरा, देहरादून।


पहाड़ उठूण इतुक सितूल न्हातिन रे,
पहाड़ उठूण, कि टयाप्प टिपि बेर पूर वां पुजै द्यैला,
कागज में रिखाड़ मारि फसल पैठाकरि,
बाग-बगीचा खिला द्यैला।
और रब्बड़ घोशि, गरीबी मिटै ल्येहला।
पहाड़ उठूण है पैल्लि, पहाड़ के अपणूण पड़ल,
जगूण, सिखूण और मनूण पड़ोल।
आं-हां, नंग्यूड़ दबूंण न,
खबरदार..............!
पहाड़ उठूण इतुक सितुल न्हातिन रे...!
पहाड़ उठूण इतुक सितुल न्हातिन रे।
बहादुर बोरा, देहरादून।

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #8 on: March 30, 2010, 11:52:47 AM »
COMMUNITY SONG Wrote by Meena Pandey म्यार उत्तराखंड

दु बेनियो जस् छिं कुमो- गडवाल
इष्टो की भूमि छु घर- घर देवी थान
देश को उत्तरी भाग सुनछो हिमाल
म्यार उत्तराखंड म्यार उत्तराखंड!

धार माझी माठु- माठु जा संध्या झुली ऐ छो
घुर घुर उज्याव जा दांड- कांदु बे चा छो
वीकी सेवा लिजी यो हमर छो प्रयास
म्यार उत्तराखंड म्यार उत्तराखंड

मिल बेर भै-बेनियो गीत नई ग्युलो
आन्दोलन चिपको जा एक और ल्युलो
अपनी भूमि लिजी तो लगे दयोल जान
म्यार उत्तराखंड म्यार उत्तराखंड!

दातुले की धार होली हुडुकी को थापा
गरीबी बेकारी को न रोलो नाम
गो-गो खुशहाली क देखु तो स्वेणा
म्यार उत्तराखंड म्यार उत्तराखंड!

शिक्षा को झोड होलो विकास ऐ छ्पेली
सबन थे स्कूल होलो च्यल हो या चेली
मेहनतकश लोगो की हिम्मत बणुलो
म्यार उत्तराखंड म्यार उत्तराखंड!

उत्तरांचल राज बनो आजादी आई
नई आस मन मे अब नई छो यो लड़ाई
नशा मुक्त होल पहाड़ हमरो छो नारा
म्यार उत्तराखंड म्यार उत्तराखंड!

खेती बाडी फल फुलली हर भर जंगला
दोफरी को घाम मे जस् बुरासी को फुला
धन्य धन्य राज हमार धन्य संस्कृति हमारी
म्यार उत्तराखंड म्यार उत्तराखंड!


Source Page: http://www.merapahad.com/forum/uttarakhand-language-books-literature-and-words/poems-on-uttarakhand/195/
 

 
 

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #9 on: March 30, 2010, 11:54:09 AM »
पहाड़ियौ उठ ! (कुमांउनी कविता )

तुम नि जाणना कि ह्वै रौ ।
तुम पथरीला गाड़ - खेतून में
'सोना' उगुने कोशिश कर छा
और 'लोहा' समझि भेर
सरहद पर भेज छा
आफन बालक....
तुम नि जाणना
बालक लोहा का बनिना का नि हुना ....
उन्स त सरहद पर 'लोहा' खान् पड़लो...!
उन शहीद नै बल्कि
राजनीती का हातून
पिटिया 'मोहरा ' ह्वाल ....
और भोल सरकारी दफ्तारून में
तुमरी बद हवाश ब्वारीन
लोग कै नज़रले देखाल ....?
तुम नि जाणना ...
ये कारन पहाड़ियौ उठ !
आफन पथरीला खेतून में
आब 'सोना ' नै बल्कि 'लोहा' उगा !


By (दीपक तिरुवा)
Source: http://bedu-pako.blogspot.com/2010/03/blog-post.html

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #10 on: March 30, 2010, 11:55:19 AM »
पड़लै च्यला पड़

पड़लै च्यला पड़
बाबूलै कय पड़लै च्यला पड़, ईजलै कय पड़लै च्यला पड़
जरां अंख देखणी है जालै, द्वीव रवट भलिकै तुई खालै
य खेती पर के नीछ बज्यान, नि हुन द्वी मैहनैक खहन

पड़लै च्यला पड़
एक मुठ्ठी निहून कहाण महाण, य खेती पर लगाई हाय खालि पराण
एतु करीबे मन्हु नीछ एक डालि, अटभट टोणण लगी रहयू खालि
च्यला तू पड़लिख जालै कसिकै, हमरी विपत्त जय क्य रहली यसिकै

पड़लै च्यला पड़
मन्हु झुंगर खाबै कसिकै दिन कटी गई, आघिन यलै पैद नीछ हणी
खेती पर छी पैली भारी इज्जत, अब यपर हैरौ खालि फज्जित
आजकै टैम नीछ पैलिक कस, अणि टैम छा डब्लुक और पैसोंक

पड़लै च्यला पड़
ईजलै त्येरी कमजोर जसी हैइ, आम्मलै आज भो जाणीये हैइ
जहाँलै खुटहात चलण रहयी, काम जैतूक हौल हम आफी करुल
मैं लै कभणी तक बैठ रुल, जहाँ लै टैम छा पड़लै च्यला पड़

पड़लै च्यला पड़
आफी ल्यूल हम घा लखड़, पाणिक लै नि कणी त्यूल फिकर
जही बै ब्या है जांछ च्यला, तहीबै को पड़ सकूँ आघिन
पढ़ीलिखी जालै, पढ़ीलिखी ब्वारी ल्यालै, हमुकै लै भल लागल

पड़लै च्यला पड़
हमर सालम यैक छा असोज, पढ़णियक लिजिक रौजे छा असोज
इस्कूलम बै आबै खेलिये झन, साग नीछ दै में रवटम खै लियै
तू भालिकै पढ़ीलिख ल्यलै, भै-बैणियों, गैव कै बाट&nbsp; दिखालै
पड़लै च्यला पड़
By Kheem Singh Rawat
Source Page: http://www.merapahad.com/forum/uttarakhand-language-books-literature-and-words/poems-on-uttarakhand/180/

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #11 on: March 30, 2010, 11:56:31 AM »
बोल...!/फ़ैज़ (कुमाउनी में )

बोल...!
कि त्यार होंट आजाद छन ,
बोल ज़बान आन्जि ले तेरी छ।
तेरो सशक्त शरीर तेरवे छ ,
बोल कि जान आन्जि ले तेरी छ।
बोल ...!
कि लुहारै कि दुकान में ,
तेज़ छन अंगार ,लाल छ लौह ।
खुलि ग्यान बंद कड़ी क मुख ,
फैलि ग्यो दामन हर जन्जिरौ ।
बोल यो थोड़ै बखत भौत छ ,
शरीर ज़बानै मौत हैं पैले ।
बोल कि सत्य जीवित छ आन्जि ले ।
बोल जिलै कूण छ कैले।


Posted by Deepak Tiruwa
Source:http://bedu-pako.blogspot.com/2009/03/blog-post.html

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #12 on: March 30, 2010, 11:57:53 AM »
श्री दीपक कार्की जी की जागर फार्म में एक कुमाऊंनी कविता

म्यार द्याप्ता मै धै योई कूनी
पैं-पैं-पैं... मैं धैं के कर कुनाछे सौकार...?
उ दिन तऽऽ छन-बिछन मैं रौंती रोछिये,
जै दिन तेरी चुलि-भाणि अलग करी,
मैं धैं पुछण-गणेश में दुब धारण त दूरेकि बात भै रे सौंकार!
उ दिन, तु मेरि कां सुणछिये,
त्वील आपण मनेकि नै सुणि।
द्वी रवाट खूंल- उत्तराखण्ड बणूंल, ऊर्जा प्रदेश बणूंल,
नान कार-बार ह्वैल, सज-समाव करुल,
और जांणि कै-के कूणि थै,
कूणि ले- नै कूणि लै, कून-कून बख्तारी रौछिये,
झपकन स्यात, लुकुड़ पैरी, स्याव-कुकुरनाक जस,
अड़ात-भिड़ात करणीं, अपुं कैं त्योर गुसै बतूणी आज।
त्यार हल्कार-बिल्कार में, को द्वार लुकी? बता.....?

म्यौर बाल-गोपाल भये रे सौकार,
म्यार कल-त्योर तौयाट-बौल्याट नि देखीन,
अघिल-पछिल जेलै करन यो अन्याई,
इनूंल त्यार नानतिननौक खापक गास नि धरि,
तु कै-के कूंण लैक नि धरि,
फिर ले भौल हुन, थान चौघाणि घत्यूण हैं पैल्ली,
सितियो कैं, सताइयों कैं धत्यूनै,
उनन कैं एक बटयूनै, फिर निकावने भ्यार,
मैसे कि ज्यून आई, रिसि कावों कैं,
घूस खोरों कैं-कामचोरों कैं,
कै भेर नि करणी कैं, नि किर भेर खाणी कैं,
उनार ख्वारन काव कामल खिति,
जांठ-मुंगारा बरसूनै, उनार ख्वार,
हर चौबट्टी में एक-एक कै टांगि,
खुश्याणिकि धूप दिनैं,
कसिक नै ऊन होश मैं.....?

पैं के करछै ? तू सिदपन मैं लागि रये,
लुटनी सिमरेणी कैं, आपण बतूनेर भये,
लेऽऽऽऽऽऽऽसमौव ले रे सौकार!
बखत छू, आजि ले। समौव नतरि..कै कें घत्यालै,
कै कें धत्याले ?
तेरि चुलि-भांणि, मेरि खई,
ढुंढि भेर नै मिल रै सौकार,
ढुंढि भेर नै मिल..........!


साभार युगवाणी, सितम्बर, २००८ से श्री पंकज महर द्वारा मेरा पहाड़ के लिए टंकित

Offline Rajesh Joshi

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #13 on: March 30, 2010, 12:00:01 PM »
समयक उखव- दाजू भलीभाख फोकव
(Kumauni Anuwad of a poem by Henry Wadsworth Longfellow by Mr. Rakesh Belwal)

समयक उखव भीतेर, सब भागक् निर्माता छन
उमें क्वै महान निर्माणकार , क्वै गीतकार लै छन
क्वे काम बेकार नि हुन भुला, हर चीजक अपण महत्व छू
और जे काम बेकार दिखूं, वीकलै दुहरकामो में ओट छू।

आजकवक ईट-गार दगड़, जो लै ढांच हम ठाड़ करनू
उकै हमैं भली-भाक सुझूण व बणूण चैं,
यस नि सोचण चैं कि क्वे उकै नि देखणौं.
हमर पुरण निर्माणकार जिनूल बहुतै जतन करो कुछीं ..
किलै नी भुला...भगवानज्यू तो देखणीं..

आओ करू अपण काम ..दीखाई द्यू भलै नैं..
आओ बणूं अपण प्रदेश पवित्र जां हमर देवी-देवता रै सकैं
नहैथै हमर जीवन समयक-उखव भितेर अधूरै रै जाल
ऊखव कूटणीं टूट जाल , हाथ-पैर सिथिल है जाल

हमकू बणूण छू अपण बुनियाद इतुक ताकतवर कि
उणीं वाल कल जैके माथ भै सकैं
हम पा सकूं उ स्थान जा बै हमरि आँख
एक एकछत्र व विशाल दुनि के साफ देख सकैं.

यो आशक दगड़ कि आप इके अमल करला.....
आपुक अपण, ऱाकेश बेलवाल
Source: http://www.merapahad.com/forum/uttarakhand-language-books-literature-and-words/poems-on-uttarakhand/165/

Offline Rajesh Joshi

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Re: कुमाऊनी कविता (Poetry in Kumauni Boli)
« Reply #14 on: March 30, 2010, 12:01:30 PM »
बाल पत्रिका दुदबोलि-2006 से साभार रचियता- श्री बहादुर बोरा ग्राम गढतिर, बेरीनाग (पिथौरागढ)


तोss र गाड़ाक ढीक बै, पूss र डानाक अदम तक फैंली
म्यार गौंक, गाड खेत
क्वै चौड चकाल, क्वै चार हात एक बैत
आहा कस अनौख लागनीं?

ग्यौं, जौं, सरच्यंक पुडांड
मडुवा, इजर, धानाक स्यार
कै में भट-गहत
कैमें चिण-गन्यार
अहा! कस रंग-बिरंग छाजनीं?

किल्ल-महलाक जास,
खुटकण, शिवज्यू मन्दिराक जास सीढि
काला क दिन बै कायम
खानदान जास पीढि-दर-पीढि!
अहा! देख बेरि मन में स्वीण जामनीं!!

लेकिन यो खालि खेतै न्हैतिन
यो स्मारक छ, यादगार छन!
एक-एक कांध मेहनत कि काथ
और संघर्षकि व्याथा बाँचनी!

तोss र गाड़ाक ढीक बै, पूss र डानाक अदम तक फैंली
म्यार गौंक गाड खेत
आहा कस अनौख लागनीं?

 

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