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  • Prabandhak: देली माँ मेरी कु धोली गे फुल्कंडि या गीतू की ,  कैन दिलयाये मैकू याद अरे उलराया रितु की,  कुछ ही दिन चन रयान , अब जुग जाण माँ ,  न फिर कैन बग्ड्वाल लाणो , न औणी याद कई भरना आर जीतू की   Dinesh Bijalwan
    March 14, 2013, 02:11:56 PM
  • Pankaj J: फेसबुक पाण्डेय काले कौव्वा, खाले, ले कौव्वा पूड़ी, मैं कें दे -ठुल-ठुलि या भल-भलि ले कौव्वा ढाल, दे मैं कें सुणो थाल, ले कौव्वा तलवार, बणे दे मैं कें होश्यार। – काले कौव्वा काले, मेरी घुघुती खाले।- आप सभी को मकर सक्रांति की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं
    January 13, 2013, 04:40:51 PM
  • Rajesh Joshi: .मंगलमय हो आपतैं, बल नयुं साल-2013, बद्रीविशाल जी की कृपा सी, जुगराजि रयन, हमारू कुमाऊँ- गढ़वाळ, दनकदु रयन आप, प्रगति पथ फर, चढ़दु रयन ऊकाळ,             (रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")+
    December 31, 2012, 12:06:21 PM
  • Prabandhak: "शेरदा अनपढ़" जी.. कविवर बौड़िक ऐन..  आखिर! आप कविवर, यीं धरती सी दूर, चलिग्यन, कुजाणि कख, कालजयी, कुमाऊनी कविताओं कू, सृजन करिक, अनंत की ओर.....  हमारा प्रिय स्वर्गवासी, जनकवि "गिर्दा" जी तैं, धरती का हाल बतैन, ऊँका चाण वाळौं की, विरह मा व्यथित, मन की बात बतैन, ह्वै सकु त फिर, "गिर्दा" जी का दगड़ा, नयुं शरीर धारण करिक, उत्तराखंड की धरती मा, कविवर बौड़िक ऐन..
    May 21, 2012, 02:25:47 PM
  • Prabandhak: प्रख्यात कुमाऊंनी कवि शेर सिंह बिष्ट यानि ’शेरदा अनपढ़’ का रविवार सायं निधन हो गया।  कुछ समय से बीमार चल रहे ७९ वर्षीय शेरदा ने अस्पताल में उपचार के दौरान अन्तिम सांस ली।  तीन अक्टूबर १९३३ को अल्मोड़ा के माल गांव में जन्मे शेरदा वर्तमान में हल्द्वानी की श्याम विहार कॉलोनी मुखानी में रह रहे थे।
    May 21, 2012, 09:46:48 AM
  • Prabandhak: मान्यवर   बुरांस परिवार की तरफ भटेय सादर सैमन्या अर  सेवा  श्रीमान जी  लोकभाषा (गढ़वली - कुमौनी अर जौनसारी )  की समस्या और समाधान थेय " कौथिग २०१२ " मा  मुंबई का प्रवासी उत्तराखंडी  समाज का बीच एक परिचर्चा का रूप मा ल्याणा की कोशिश मुंबई का बुरांस संगठन कु एक प्रयास ,लोकभाषा का क्षेत्र मा पिछला २५ बरसौं भटेय आंदोलनरत धाद संगठन का  " धाद लोकभाषा एकांश "  की विमर्श श्रंखला  "आखिर कनकै  बचऽलि भाषा " मा हम आप्थेय लोक भाषा प्रेमी और बुद्धिजीवी  का रूप मा आपक वैचारिऽक उपस्थिति का वास्ता  सादर न्यूतणा छौं ,   कार्यक्रम मा आपकू आणु और आप्की भागीदारी थेय बुरांस परिवार अप्डू  सौभाग्य सम्झलू  कार्यक्रम मा आप्की जग्वाल रैली  शुभकामनाओं  दगड आपकू अप्डू गीतेश सिंह नेगी जग्वाल मा :  बुरांस परिवार मुंबई ,धाद लोकभाषा एकांश व कौथिग परिवार मुंबई संपर्क सूत्र : ०८७९१५६११०८,०९६१९००४७९७
    April 23, 2012, 12:44:33 PM
  • Editor Garhwali: Mujib Naithani सेमन्या उत्तराखण्ड..बल ..अगर आपको हाई प्रोफाईल ड्रामा सिखना हो तो कांग्रेस से सीखो ..बल ..केंद्र में आते ही सौ दिन का एजेंडा कई दिन मीडिया में चला ..बल अब तो कई सौ दिन बीत गए पर एजेंडा बल पता नि कख हर्ची गे / वनी एक मंत्री दीदा आते ही हवाई फायर हो गए ये तैयार करो ...वो..बड़ी बड़ी बातें ..बल ..लम्बी लम्बी गप्प ..मुझे स्कूल की दैनिक रिपोर्ट चाहिए ..बल इन लगणु च की मंत्री दीदा पहाड़ी नि छन /बल ..किले...
    April 11, 2012, 02:30:16 PM
  • VINOD GARIYA: "कौ लाटा आण काथा, सुण काला तु , अनाड़िल घट लगाई, दौड़ डुना तु"
    December 26, 2011, 04:29:54 PM
  • Admin: नय्या पीढ़ी आपनी पछाण भुल्या धारा नौला आपना पहाड़ भुल्या  गौं में कि भुल्यु चेलो इसके बतुछ बस द्वी आँखा चार हाड भुल्या  भोट मांगन घर घर डेली उनान सब कॉल करार इन गंज्याढ़ भुल्या  "गुमनाम पिथौरागढ़ी "
    December 25, 2011, 09:49:06 AM
  • Rajesh Joshi: कुमाऊँनी रिस्त... माँ - इजा पापा - बौज्यू भाई - भै बहन - बैणि दादा, नाना - बूबू दादी, नानी - आमा चाचा - कग चाची - काखि ताई - ज्यार्ज पड़ोसी - आमा, बूबू, बोजि या पै नानतिन.. बाकि मैंस तो सब प्लेन्स जै रयीं डबल कमूणे लिजी !
    October 05, 2011, 10:09:20 PM

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Author Topic: गढ़वाली गद्य साहित्य / धर्म सिंह कठैत(अजनबी)  (Read 574 times)  Share 


पदानी बोडी का मन कु मैल ..मेरा मन की बात  



बौत साल पुराणी बात छ हम छोटा छोटा थान | क्या छ होनु या समझ थें पर क्या कन्न यी नी जाणदा थान | पदानी बोडी तें भोला दीदा का खुगला पर बेसुध पड़यूँ देखि तें मन माँ एक  सकून सी मिली अर दगड़ा माँ याद ओंण लगिगे बोडी की व चिल्स्य-पिलसी, उ नाज उ नखरा | इंसान जब असमर्थ व्हे जांदू त कख हर्ची जांदा मन का उ बैम,उ विचार सब इंसान बराबर व्हे जांदा क्वी छोटु नि क्वी बाडू नी क्वी ऊँच नी क्वी नीच नी |

भोला दीदा हमारा गौं कु मोची छ | पुराणी रीति सी हमारू गौं भरु- पुरु गौं थों |हमारा गौं माँ मोची, ल्वार, सुनार , औजी, बामण, भंडारी, कठैत  इथ्गा लोग रंदा छन| फसल पात भी खूब ही होंदी छाई पैंसी टक्की त ते जमाना माँ होंदी ही नी थैं |कभी का दिनु माँ सारा गौं का जुत्ता मोची बनादा थान, कुल्ली -दाथाड़ी  ल्वार बनादा थान, लत्ता -कपड़ी   औजी थान |अर बदला माँ सभी परिवारू सी  फसल व्हाण  पर  डाड़्वार ली जांदा थान | बस सारू गौं एक- हक्का  का सारा ही रांदु थों | ओंसी संग्रंदी हो, तीज हो त्यौहार हो,ब्यो कारज हो सब सामिल सब अपुरु सहयोग देनदा थान  आज सभी धणी बदिलिग्या बस कुछ भी उनु नी राइ |

पदानी बोडी बड़ी भेद भाऊ करीदी छाई कई हाकी जाती वालन धारा माँ पाणी भोरी त वीन दस बार धारू ध्वान थों ,गिल्ला कपड़ों मा कै पर हाथ नी लगान्दी थें  | जै झांकरी बोडिं कभी चा कु गिलाश भोला दीदा का हाथ पर नी पकडे थों आज वेकि ही खुगली मा बेसुध पड़ीं थें | अर भोला दीदा वींका का मुख पर पाणी का छिंटा  मान पर थोन झुक्युं की कब बोडी होश मा आली | बोडी होश मा आई |भोला भाई ण बोडी घुघु मा धरी अर घर  पोंचाई दिनी |बोडी  मन कु सारू मैल धूलि गयी | उ दिन थोन अर बस कभी भी झांकरी बोडिं फिर कभी भेद भाऊ नी करी |मांखी मरी तें स्वर्ग व्हे जांदू आज न  ही झांकरी बोडी छ न  भोला दीदा छ| पर उनकी याद सदनी मेरा मन मा राली |

  
« Last Edit: July 13, 2011, 01:35:01 PM by Rajesh Joshi »

बाघे मुलकात अर मेरु बालु मन  


 आज फिर कुछ  लेखणों कु मन व्हे त अचान्चक मैं तें मेरी बाघ की गैल पैली मुलाकात याद आई | त आप गैल बटुणु छों|  मेरा जीवन की बड़ी रोमांचकारी घटना छ | बौत पुराणी बात उन दिनु की छ हम चोट्टा छां अर स्कूल्या थां | असूज का मैना की द्वी सारी धाण, खाणी नी सेणी नी, कखी साट्टी-झंगोरू, त काखी कुदाड़ी सारी दाल-गौथ  कोदू-मार्सू धाणी कु नौ नी ज्यू कु थौ नी | लोग दिन रात सारियों  रंदा पड्यां |मेरी इक्ल्वारस्य  माँ परेसान क्या त करो, क्या त करो | इक्ल्वार्स्य माँ कु बस हमू पर त चन्न  थों  माँन  बोली बेटों स्कूल जाण सी पैली एक-एक गडोली मार्सा की लै द्या दों | मैं ६ माँ पड़दु  थों  आर मेरु दीदा ९ माँ  हमारा स्कूल जाण का बाद सारा दिन भर  त माँन अकेली ही कन्न थें सभी धणी | चली गयों द्वी भाई सुबेर राति,घाम भी नि आई थों, चा पि तें मुक्क भी नि ध्वे, जूडू-दथुदु उठाई अर लगिज्ञों बाठ ऐथर  फुण  मैं पैथर फुण मेरु भाई | बठा  माँ हमारा गौं की नोनी मिली बोन्नी आज  सुबेर राति...... !
हमुन बोली हाँ | चली ग्यों  ऐथर अजे सारी माँ  ही पोंछी थान की हमारा गौं का पदान बड़ा का ड़ोखरा  मा बाघ .......! मेरी सिट्टी पिट्टी गोल, रोणे की फिचिन्दाली,मैं रोण पर झुक्युन अर मेरु भाई मैं चुप करों पर झुक्युन |   मैं भी  मेरु भाई भी मुड्यों  वापस अर उकाल का बाठा  घर कु भाग्यों मुठियों पर थूक लागेक | मैं लगी कि आज बाघन खैल्यों,  उकाली का बाठा  गोली की तरों  थां हम भागण लाग्यां | गौं का नजदीक पोंछी तें मैं पैथर छों देखुनु की कखी बाघ पिछाड़ी त नी आणु | भाई मी तें चुप करेक थाकिगी पर मी चुप नि व्होयों बौत देर का बाद भाई न बोली भुला धर्मी अब चलिगी होलू बाघ चल अब जोला |
       आज भी मी तें बाघ की गिल व पैली मुलाकात याद आंदी त मेरा रोम-रोम खड़ा व्हे जांदा | साथ ही याद आई जंडू उ प्यारु बचपन जै मा जाणो कु मेरु ज्यू तर्स्णु रांदु |  
« Last Edit: July 13, 2011, 01:34:40 PM by Rajesh Joshi »

 

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