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  • Prabandhak: "शेरदा अनपढ़" जी.. कविवर बौड़िक ऐन..  आखिर! आप कविवर, यीं धरती सी दूर, चलिग्यन, कुजाणि कख, कालजयी, कुमाऊनी कविताओं कू, सृजन करिक, अनंत की ओर.....  हमारा प्रिय स्वर्गवासी, जनकवि "गिर्दा" जी तैं, धरती का हाल बतैन, ऊँका चाण वाळौं की, विरह मा व्यथित, मन की बात बतैन, ह्वै सकु त फिर, "गिर्दा" जी का दगड़ा, नयुं शरीर धारण करिक, उत्तराखंड की धरती मा, कविवर बौड़िक ऐन..
    Today at 02:25:47 PM
  • Prabandhak: प्रख्यात कुमाऊंनी कवि शेर सिंह बिष्ट यानि ’शेरदा अनपढ़’ का रविवार सायं निधन हो गया।  कुछ समय से बीमार चल रहे ७९ वर्षीय शेरदा ने अस्पताल में उपचार के दौरान अन्तिम सांस ली।  तीन अक्टूबर १९३३ को अल्मोड़ा के माल गांव में जन्मे शेरदा वर्तमान में हल्द्वानी की श्याम विहार कॉलोनी मुखानी में रह रहे थे।
    Today at 09:46:48 AM
  • Prabandhak: मान्यवर   बुरांस परिवार की तरफ भटेय सादर सैमन्या अर  सेवा  श्रीमान जी  लोकभाषा (गढ़वली - कुमौनी अर जौनसारी )  की समस्या और समाधान थेय " कौथिग २०१२ " मा  मुंबई का प्रवासी उत्तराखंडी  समाज का बीच एक परिचर्चा का रूप मा ल्याणा की कोशिश मुंबई का बुरांस संगठन कु एक प्रयास ,लोकभाषा का क्षेत्र मा पिछला २५ बरसौं भटेय आंदोलनरत धाद संगठन का  " धाद लोकभाषा एकांश "  की विमर्श श्रंखला  "आखिर कनकै  बचऽलि भाषा " मा हम आप्थेय लोक भाषा प्रेमी और बुद्धिजीवी  का रूप मा आपक वैचारिऽक उपस्थिति का वास्ता  सादर न्यूतणा छौं ,   कार्यक्रम मा आपकू आणु और आप्की भागीदारी थेय बुरांस परिवार अप्डू  सौभाग्य सम्झलू  कार्यक्रम मा आप्की जग्वाल रैली  शुभकामनाओं  दगड आपकू अप्डू गीतेश सिंह नेगी जग्वाल मा :  बुरांस परिवार मुंबई ,धाद लोकभाषा एकांश व कौथिग परिवार मुंबई संपर्क सूत्र : ०८७९१५६११०८,०९६१९००४७९७
    April 23, 2012, 12:44:33 PM
  • Editor Garhwali: Mujib Naithani सेमन्या उत्तराखण्ड..बल ..अगर आपको हाई प्रोफाईल ड्रामा सिखना हो तो कांग्रेस से सीखो ..बल ..केंद्र में आते ही सौ दिन का एजेंडा कई दिन मीडिया में चला ..बल अब तो कई सौ दिन बीत गए पर एजेंडा बल पता नि कख हर्ची गे / वनी एक मंत्री दीदा आते ही हवाई फायर हो गए ये तैयार करो ...वो..बड़ी बड़ी बातें ..बल ..लम्बी लम्बी गप्प ..मुझे स्कूल की दैनिक रिपोर्ट चाहिए ..बल इन लगणु च की मंत्री दीदा पहाड़ी नि छन /बल ..किले...
    April 11, 2012, 02:30:16 PM
  • VINOD GARIYA: "कौ लाटा आण काथा, सुण काला तु , अनाड़िल घट लगाई, दौड़ डुना तु"
    December 26, 2011, 04:29:54 PM
  • Admin: नय्या पीढ़ी आपनी पछाण भुल्या धारा नौला आपना पहाड़ भुल्या  गौं में कि भुल्यु चेलो इसके बतुछ बस द्वी आँखा चार हाड भुल्या  भोट मांगन घर घर डेली उनान सब कॉल करार इन गंज्याढ़ भुल्या  "गुमनाम पिथौरागढ़ी "
    December 25, 2011, 09:49:06 AM
  • Rajesh Joshi: कुमाऊँनी रिस्त... माँ - इजा पापा - बौज्यू भाई - भै बहन - बैणि दादा, नाना - बूबू दादी, नानी - आमा चाचा - कग चाची - काखि ताई - ज्यार्ज पड़ोसी - आमा, बूबू, बोजि या पै नानतिन.. बाकि मैंस तो सब प्लेन्स जै रयीं डबल कमूणे लिजी !
    October 05, 2011, 10:09:20 PM
  • Admin: हुक्का . तमाक , पानी बहुते याद ऊछ नानी रात ठुली कहानी बहुते याद ऊछ  रात्ते,छाकला ,ब्याल जतारान में पीसी रूथी हमारी भूख इजा की परानी बहुते याद ऊछ "गुमनाम "
    August 07, 2011, 04:24:33 PM
  • Rajesh Joshi: बेटे की कहानी बाब की जबानी  आजकल का नोनुं न कमरा माँ लगी देवतो की फोटो पता नि कख फेकली उन फोटो की जगह पर KATRINA की फोटो लगेली. चला मेन सोची में भी देखुलू कण हुंदा इंडर का मेडल ...सिरन्दा तला धरया निर्भागी का दुनिया भर का LOVE LETTER. सब तितरा फतिग्या मेरा पेनो क नि रायु सूरार आर वेते चेणु नयोन क LUX और HAMAM. मेडी वेगी MOM , DAD बाबा. मेंन बोली क्या बुनू मी नी बिन्गाणु मेरु लाटा गीत लगनु एक वू I LOVE YOU, I LOVE YOU में समझी ख़राब होगी होलू डबा हुनो बस्युलू घयु copyright Anju Bartwal ;)
    July 26, 2011, 07:42:57 AM
  • Rajesh Joshi: पहाड़ी ग़ज़ल  जब व्हे खोरि कपास व्हे ग्ये बुडा-बदिन की मजाक व्हे ग्ये  ...ज़माना आग लागो तेरी खोरि ले प्यार ,मुहब्बत ले टाइम पास व्हे ग्ये  देव पित्तर पाथरों ले ढाकी हल्या सारि देवभूमि शराब की दास व्हे ग्ये  बैंड में काँटा लगा इसो चल्यो छोलिया संस्कृति को नास व्हे ग्ये  जब ले जान्छ चेलो परदेश इजा का आँखा चोमास व्हे ग्ये  "गुमनाम पिथोरागढ़ी "
    June 22, 2011, 09:07:18 PM

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Author Topic: गढ़वाली कविता श्री जगमोहन सिंह जयाड़ा (Jigyasu)  (Read 14223 times)  Share 

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जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
 
पिता का नाम-स्व. कुन्दन सिंह  जयाड़ा

जन्म- मुज्जफरनगर, उत्तर प्रदेश. पैतृक ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी  गढ़्वाल।
     वर्तमान स्थायी निवास- संगम विहार, नई दिल्ली।
     
शिक्षा- १०+२,  मूल लेखन- गढ़वाली मा। शौक- कविता, छायांकन, घुमक्कड़ी, बांसुळ बजाना,
         संगीत सुनना.
प्रकाशित-  गढ़वाली कवितायेँ- यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़, भागीरथी, उत्तराखंड संगम
     समाज स्मारिका, पर्वत्वासी मा.
« Last Edit: April 13, 2010, 04:22:02 PM by Admin »

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"गंगा जी का मैती"

तिस्वाळा छन आज,
जख बिटि औणि छ गंगा,
अर बग्दु जाणी,
पहाड़ छोड़ी दूर,
सागर की तरफ.

छोया ढुंग्यौं कू पाणी,
हर्चंणु छ आज,
तिस्वाळा छन मन्खी,
अर छन घंगतोळ मा,
बिना पाणी कू क्या करौं?
जाणा छन गौं छोड़ि,
यनु अपणा मन मा सोचि,
तिस्वाळा किलै मरौं.

कथगा धौळि बगणि छन,
देवभूमि उत्तराखंड मा,
ऊंकू पाणी पर्वतजनु तैं पिलावा,
बंजेणा  छन घर गौं,
सरकार तैं भी समझावा.

पैलु हक्क  पर्वतजनु कु छ,
उंकी तीस बुझावा,
धौळ्यौं कू बग्दु पाणी,
पम्प करिक पहाड़ मा,
गंगा जी का मैत्यौं तैं,
छकि-छकिक पिलावा,
तिस्वाळु न सतावा.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा  "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १२.४.२०१०)

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

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कवि का मन का एक कसक होन्दि  छ, अपणी संस्कृति, समाज अर जन्मभूमि का प्रति.  कलम ऊठैक अपणा मन का भाव, ऊमाळ  लिखिक व्यक्त कन्न कू मतलब....भाषा अर  संस्कृति जिन्दा रखण कू प्रयास, पहाड़ सी प्रेम, अतीत अर आज कू कलम सी चित्रण छ.  उत्तराखंडी  भै बन्धु अपेक्षा छ आप अपणी प्रतिक्रिया व्यक्त करदु रला अर मेरु कवि मन कविताओं का माध्यम सी आपका नजिक रलु.  

जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
दूरभास : 9868795187
E-Mail: j_jayara@yahoo.com  



http://himalayauk.org/tag/poem-garwali/

http://e-magazineofuttarakhand.blogspot.com/

http://www.merapahadforum.com/uttarakhand-language-books-literature-and-words/poems-on-uttarakhand-~!!!/255/

http://blogs.rediff.com/devbhoomiuttarakhand/
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« Last Edit: July 02, 2010, 12:49:49 PM by जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" »

Offline धनेश कोठारी

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देब्तान बोलि

एक दिन जब आफत आई,
कुल देब्तान किल्किक,
कौम्पि कौम्पिक बताई,
सुण भगत त्वे फर,
लग्युं छ मेरु दोष,
कै बार चिनाणु दिनि मैन,
पर त्वे सने नि आई होश.

पैलि त तू मेरु मंडलु,
घसि लिपिक घड्याळु लगौ,
कै सालु बिटि नि दिनि पूजा,
अपणा मन मा आस्था जगौ.

मैन बोलि देब्ता,
अब मैं खाण कमौण का खातिर,
घर बार छोड़िक छौं ये परदेश,
देवभूमि मा देब्ता जनु थौ,
अब यख बणिग्यौ खबेस.

संकल्प छ मेरु देब्ता,
जब मैं अपणा गौं उत्तराखंड जौलु,
देखलु अपणि जन्मभूमि,
दया दृष्टि रखि मै फर,
जरूर तेरु घड्याळु लगवौलु.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित ११.२.२०१०)
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देवभूमि मा पड़िगी ह्यूं

याद ऐगि ऊँ दिनु की,
या खबर सुणिक,
जब सैडि रात होन्दि थै बरखा,
अर सुबेर उठिक देख्दा था,
ह्यूं पड़युं चौक, सारी, डांडी, कांठयौं मा,
खुश होन्दु थौ मन हेरि हेरिक,
देवभूमि उत्तराखण्ड मा.

आस जगणि छ मन मा,
खूब होलि फसल पात,
मसूर, ग्युं, लय्या फूललु,
ज्व छ बड़ी ख़ुशी की बात.

बस्गाळ अबरखण ह्वै,
महंगाई सी टूटणि छ कमर,
ह्युंद की बरखा वरदान छ,
नि रलि महंगाई फिर अमर.

पड़िगी ह्यूं बल उत्तराखंडी भै बन्धु,
औली, हेमकुंड, चोपता, तुंगनाथ, जोशीमठ,
धनौल्टी, त्रियुगीनारायण, ऊखीमठ,
खुश ह्वैगिन देवी देवता जख चार धाम,
डांडी, कांठयौं मा चमलाणु छ घाम,
सच बोलों त जन चमकदी छ चाँदी.

अपणा मुल्क की जब मिल्दि छ,
जब यनि भलि खबर सार,
आशा कर्दौं आप भी खुश होन्दा होला,
"देवभूमि मा पड़िगी बल ह्यूं"
जू ल्ह्यालि खुशहालि अपार.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
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हे चुचा ढुंगा न बोल

अपणु एक लंगोट्या यार, बोन्न बैठि,
भैजि "जिग्यांसू",
आपन सब्बि धाणी फर लिख्यलि,
जरा ढुगां सरख्या मन्ख्यौं फर भि लिखा,
किलै नि लिखि, अजौं तक?
मेरा मुख बीटि छट छुटि,
हे लाठ्याळा यनु न बोल,
मन्ख्यौं सी गुणवान छन,
मुख्याळा अर् प्यारा ढुगां.
यार फिर बोन्न बैठि,
यनु कनुकै ह्वै सकदु,
ढुगां जैं कुंगळा होन्दा,
ता स्याळ भूखा किलै मरदा.
तब मैं बोलि सुण,
ढ़ुगौं मां छन बड़ा गुण....
चार धाम, पञ्च बद्री, पञ्च केदार,
पित्र कूड़ा, कूड़ी भांडी, पैरि पगार,
जान्दरी, ऊख्ल्यरि,डांडी कांठी,
घट्ट, देवतों का मंडुला, छान,
यथ्गा कि टीरी कू डाम,
सब ढुगौं का बणयां छन,
क्य, मन्ख्यौं फर छन यना गुण.

By: जगमोहन सिंह जयाड़ा, जिग्यांसू
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
24.2.2009 को रचित
दूरभाष: ९८६८७९५१८७
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छुटदु जाणु छ
लड़ि भिड़िक लिनि थौ जू,
हाथु सी छुटदु जाणु छ......
बित्याँ बीस सालु बिटि,
बारा लाख उत्तराखंडी,
पलायन करि-करिक,
रोजगार की तलाश मां,
देश का महानगरू जथैं,
अपणी जवानी दगड़ा लीक,
बग्दा पाणी की तरौं,
कुजाणि क्यौकु सरक-सरक,
प्यारा उत्तराखण्ड त्यागि,
आस अर औलाद समेत,
कूड़ी पुन्गड़ि पाटळि छोड़ि,
कूड़ौं फर द्वार ताळा लगैक,
कुल देवतौं से दूर देश,
नर्क रूपी नौकरी कन्नौ,
दूर भाग्दु जाणु छ.
बलिदानु का बाद बण्युं,
प्यारु उत्तराखण्ड राज्य,
हाथु सी छुटदु जाणु छ.....

आंकडों का अनुसार बल,
राज्य विधान सभा मां,
पलायन की परिणति का कारण,
पहाड़ की आठ घट्दि सीट,
घट्दु पहाड़ कू प्रतिनिधित्व,
हम तैं, यनु बताणु छ.
लड़ि भिड़िक लिनि थौ जू,
हाथु सी छुटदु जाणु छ......
खान्दि बग्त टोटग उताणि,
मति देखा मरदु जाणी,
बिंगि लेवा हे लठ्याळौं,
छौन्दा कू भि होयिं गाणि,
अब नि जावा घौर छोड़ि,
जख छ, छोया ढ़ुंग्यौं कू पाणी.
समळि जावा अजौं भी,
बग्त यू बताणु छ,
लड़ि भिड़िक लिनि थौ जू,
हाथु सी छुटदु जाणु छ......

जगमोहन सिंह जयाड़ा, जिग्यांसू
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
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तीन पराणी
(पहाड़ सी पलायन की परिणति या ही छ, गों माँ अब जू कुछ लोग छन वू मेरी कल्पना मा घन्ना, मंगतु अर मोलु सरिख्या छन. गों का लोग वूँ तैं भली नजर सी देख्दा छन, किलैकी गौं माँ वूंकी वजह सी रौनक छ. मेरी स्वरचित कविता छ 'तीन पराणी' )


एक गों का तीन पराणी, घन्ना, मंगतु, मोलु,
ऊँची धार मां बैठी बोल्दा, कब होलु मुंड निखोलु.
घन्ना भै फर रोग लागिगी, पैन् लग्युं छ दारू,
समझावा त बोल्दु छ, कन्नु मुर्दा मरी तुमारू.
जनम बीती छ निर्पट लाटू, फुंड धोल्युं स्यु मोलु,
उल्टा कम करिक बोल्दु, कब होलु मुंड निखोलु.
मंगत्या बन्युं छ मंगतु गौं माँ, या छ वैकी लाचारी,
अलगस का बस ह्वैक होईं छ, दुनिया वैकी न्यारी.
जब जब कठा होंदा छन, गौं का यी तीन पराणी,
छुयों माँ सी बिल्मै जांदा, ब्वई रन्दी, तौंकी भट्यानी.
तोउ भी सैडा गौं का लोग बोंना छन, यी छन हमारा लाल,
ऊंसी त यी भला ही छन, जौन छोडियाली गढ़वाल.

(१०.६.२००६ को रचित)
जगमोहन सिंह जयारा, जिग्यांसू
पोस्टेड:३०.०५.२००८

jayara@yahoo.com
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दुनियाँ माँ दारू
(दारू तुम भौं कै सने पीले देवा त वू तुमारू काम झट करि देल्यू किलैकी या बड़ा काम की चीज छ मेरी नजर माँ. वन त या बुरी चीज छ पर काम भी बनौंदी छ. चतरू मेरी कल्पना कु एक किरदार छ।)


बड़ा काम की चीज छ, यीं दुनिया माँ दारू,
कैका त या काम बणोंदी, कैकू करदी खारू.
चतरू तैं बल लोन मिलिगी, वैन पिलाई दारू,
दारू चुवोण का खातिर ल्यायही, पीठी माँ भेल्लियों कु भारु.
परधान पटवारी एक दिन ऐन, चतरू वून समझाई,
पैला फूल की हम्कु भेजी, कारिले खूब कमाई.
मग्तु मोलू दारू चुवोणा, मुख फर लग्युं छ खारू,
अपना मन् माँ बोन्न लग्याँ, मुर्दा मरिगी हमारू.
घन्ना भाई तैं कैन बताई, चतरू चुवोणु छ दारू,
मुल मुल हैंसी बोन्न लग्युं छ, उछ लंगोत्त्या यार हमारू.
घन्ना की ब्वैई रोण लगीं छ, येन करयाली खारू,
चतरू की जड़ मरिगी, चुवोण लगियुं छ दारू.

जगमोहन सिंह जयाडा, जिग्यांसू
११-६-२००६ को रचित
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बाघ बन्न्याँ खौंबाघ
(या मेरी एक यनि रचना छ जू मेरी कल्पना माँ उत्तराखंड का बाघु पर छ जब उत्तराखंड कु स्वपन साकार होई त उत्तराखंड का बाघ बड़ा चिंतित ह्वैन. वूंका मन माँ एक बात आई, अब उत्तराखंड माँ विकास होलु त हम कख रौला. आज वू मनख्यों फर बिल्कना छन किलैकी वूं तैं हमारा अपनी संस्कृति कू त्याग कन्न फर गुस्सा भौत छ.)

उत्तराखंड जब बणन लग्युं थो, मन माँ होईं थै ड़ौर,
बाघ बिचारा अब कखा राला, छोडन पद्दलू वूं घौर.
उत्तराखंड का बाघ बन्न्याँ छन, आज देखा खौंबाघ,
मनख्यों मारी मारी खांना, बोन्न लग्याँ छन भाग.
सच मा माणा यी भी छन, सच्चा उत्तराखंडी,
सबक सिखौंना छन वू हम्तैं, बोन्न लग्याँ पाखंडी.
मन मा सोचा आज लाठ्यलों, क्या छ वूंकू दोष,
करम हमारा देखि देखि, ऑउण लग्युं वून रोष.
देवभूमि का वासी छौं हम, बन्निगियों आज मसान्,
मनन कर तुम अप्न्ना मन मा, क्या छ हमारी पछाण.
वीर भड्डू की भूमि मा, यी बाघ बन्न्याँ खौंबाघ,
संस्कृति सी दूर न भागा, बोन्न लग्याँ छन जाग.

जगमोहन सिंह जयाडा, "जिग्यांसू"
२६-१२-२००६ को रचित
Source: Young Uttarakhand Forum
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बोडी बैठी बस मा

("बोडी बैठी बस मा" मेरी एक यानि रचना छ जू मकरैनी का मेला पर आधारित छ. अतीत मा उत्तराखंड का लोग पंचमी, मकरैनी का मेला देवप्रयाग, दुन्ध्पर्याग,श्रीनगर, व्यासचती, नहेन जांदा था. गौं गौं बीटी लोग पैदल चलिक या बस सी मेला जांदा था. यूं मेलों फर उत्तराखंड का कवियों का सुंदर पारंपरिक गीत भी लिखंयाँ छन. भुल्लों मैकू आज याद ओऊँदी यूं मेलों की, पर क्या कन्न बोल्या दादा की तरों बोल्या बन्निक लिखान्णु छोउन मन का उमाल.)


बोडी गै मकरैनी का मेला, वीं खेन जलेबी केल्ला,
घुम्दु घुम्दु ख्याल आयी, वीं दग्रियों तैं बताई.
चला अब घौर जौला, देर ह्वैगी क्या बतोला,
तब वू सब्बी बस मूं गैन्, सीट नि थै खडू ह्वैन.
बोडीन नजर दौड़ाई, सीट एक खाली पाई,
क्वी नी बैठ्युं यीं मा कयोकु, सैद खाली रखीं मैकू.
बोडी वख मु बैठी ग्याई, एक घेरी जलेबी खाई,
तब्रियों ड्राईवर आई, सीट मेरी वेन बताई.
बोडी बोन्नी हाथ जोरदु, तेरु रिवाज आज तोरदू,
मेरी सुण तू पिछने बैठ, मैं दग्दी सुदी नी एईन्ठ.
ड्राईवर बोन्नु क्या बतान्न, बोडी त्वैन्न घौर नी जाण.
हाथ जोरदु बोल्युं माण, मैं ही त बस चलान्न.
तब्रियों नौनु एक भट्याई, यख मु बैठ वेन बताई,
बोडी भीड़ मा भब्ब्सेंनी, मन ही मन मा गाली देन्नी.
बोडी बैठी खिड़की फर, नींद आयी वीं तैं सर,
बोडी देखि डग्रिया हैन्सनी, बोडी कन्नी खर खर.
बस सड्की फुंड जान्णी, सब्बि अफुमा छ्वीं लगांनी,
सुपिना मा खोयीं बोडी, एक घेरी जलेबी खान्नी.
दग्दियोंन बोडी घल्कैई, खडू उठ वून बताई,
घौर अब हमारू एईगी, एक फलांग सिर्फ़ रैगी.
घौर हम्तैं जग्न्ना छन, सड्की फुंड भागना छन,
अगल्या साल फिर जौला, चूड़ी, मछली,फोंदनी ल्योहोल्या.


जगमोहन सिंह जयाडा "जिग्यांसू"
Source: Young Uttarakhand Forum
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हिट मनखि

उकाळ उंदार जनि जिन्दगी मा,
बाटा फुन्ड लठगदु, गिरदु अर पड़दु,
जख तक ह्वै सकु दुनियाँ का दगड़ा,
पिछ्नै नि रणु, हिट फटाफट हे मनखि.

हिटण पड़लु किलैकि मनखि,
हिटणु तेरु काम छ जिन्दगी मा,
उकाळ जनि उलझन सुलझैक,
उंदार जनु सुख मेहनत सी पैक,
आसान ह्वै जान्दि छ जिन्दगी,
घंगतोळ मा पड़्याँ मनखि.

पहाड़ की तड़तड़ी ऊकाळ,
बचपन मा स्कूल जान्दु,
हिट्यौं हम पाड़ी छोरा,
काँडा भि चुभ्यन नांगा खुटौं फर,
जुत्ता कम ही पैरदा था मनखि तब,
उकाळ उंदार जनि जिन्दगी मा,
आज यनु निछ जमानु,
पिछ्नै नि रणु,
फटाफट हिट हे मनखि.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित २०-४-2010)
Source--
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बाग बिल्कि

भग्तु बोडा फर बिल्कि बाग,
ब्याखुनि बग्त ब्याळि,
हबरि बोलि बल वैन,
डुकरी-डुकरिक माटु खैणिक,
क्या त्वैन बिंग्यालि?
बिंगण मा त यनु औणु छ,
मन्ख्यौंन वैकु ठिकाणु जंगळ,
काटी काटिक बर्बाद करियालि,
बाग रलु बण बूट बचलु,
होलि खूब खाणी बाणी,
छकि छक्किक मिललु सब्ब्यौं,
छोया ढुंग्यौं कू पाणी.
बाग बोन्ना छन हम बचावा,
मिललु तुम सनै सब्बि धाणी,
किलै बिल्कणा छौं हम,
तुम्न अजौं यनु नि जाणी.
कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-"बाग बिल्कि" ६.५.२०१०)
(यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
"अपणा मुल्क छोड़ि"
सब्बि भै बन्धु बतावा,
अपणा प्यारा मुल्क छोड़ि,
तुम भौं कखि न जावा.....
बिराणु अपणु नि होन्दु,
मन मा बिंगा अर बतावा,
मुक मोड़िक न जावा,
अपणा प्यारा मुल्क छोड़ि,
तुम भौं कखि न जावा.....
जख जन्म ह्वै हमारू,
वख द्वार ताळा न लगवा,
सब्बि भै बन्धु समझावा,
अपणा प्यारा मुल्क छोड़ि,
तुम भौं कखि न जावा.....
कूड़ी पुंगड़ि बांजा डाळी,
अपणु मुल्क छोड़ि न जावा,
सब्बि भै बन्धु समझावा,
अपणा प्यारा मुल्क छोड़ि,
तुम भौं कखि न जावा.....
जख देवतौं का थान,
भूमि स्वर्ग का समान,
सब्बि मनख्यौं कू मान,
तब्बित बोल्दा छन लोग,
हमारी प्यारी जन्मभूमि,
स्वर्ग का छ समान,
सब्बि भै बन्धु समझावा,
अपणा प्यारा मुल्क छोड़ि,
तुम भौं कखि न जावा.....
रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित -"अपणा मुल्क छोड़ि" २.५.२०१०)
(यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर बि प्रकाशित)
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"देवभूमि का ढुंगा"

देव्ता समान  छन,
किलैकि पित्रुन पूज्यन,
ध्यु धुपाणु दीक,
मंडुला भीतर थर्पिन,
कुजाणि कबरि?
हम भी पूज्दौं  सुबेर,
ब्याखुनी बग्त सदानि,
कुल देव्ता माणिक,
जब तक यीं धरती मा,
सुखि दुखि जनि रौला.

हे देवभूमि का ढुंगौं,
तुम्त कालजयी छैं,
जुग जुग राजि रैन,
हम्त औला अर जौला,
कर्मु की गति का अनुसार,
कुजाणि कख कख,
पुनर्जनम धरि धरिक.

 रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित २१.४.२०१०)
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"जगदेई की कोलिण"

जैन्कु असली नौं क्या थौ, क्वी नि जाणदु,
कोसी अर् रामगंगा का, बीच कू इलाकु,
जख गोर्ख्यौन अत्याचार करिन,
वींकी बहादुरी की बात, आज भी माणदु.

जल्लाद गोर्ख्याणि जब, काळी कुमौं मा,
सल्ट की बस्तियौं मा ऐन,
लोग उन अत्याचार करिक,
तड़फैन अर् सतैन.

दूधि पेंदा छ्व्ट्टा बच्चा, जल्लाद गोर्ख्यौन,
ऊख्ल्यारा कूटिन, लोगु की सम्पति लूटिन,
ज्वान नौना नौनी ऊन, दास दासी बणैन,
कुछ बेचि थूचिन, कुछ नेपाल ल्हिगिन.

जगदेई की कोलिण कामळी बुणदि थै,
ऊंका खातिर, जू गोर्ख्यौ की डौर कु,
लुक्यां था लखि बखि बणु मा,
जान बचौण का खातिर,  कोल्यूं सारी,
जगदेई का नजिक, सल्ट क्षेत्र मा.

जगदेई की कोलिण,
जलख अर् जमणी का बीच,
अपणी झोपड़ी का ऐंच,
एक ऊंचि धार मा गै,
बदनगढ का पार, हो हल्ला सुणिक,
सल्ट जथैं उठदु धुवाँ देखिक,
ग्वर्ख्या आगीं-ग्वर्ख्या आगीं,
जोर-जोर करिक भटै.

कोलिण कू भटेणु सुणिक,
द्वी जल्लाद गोरख्या सिपै,
झट्ट वख मू ऐन,
कोलिण का कंदुड़,
नाक अर् स्तन काटिक,
अपणी राक्षसी प्रवृति का,
क्रूर कर्म दिखैन.

कोलिण का प्राण, पोथ्लु सी ऊड़िगैन,
जल्लाद गोरख्या सिपैयौन,
कोलिण की लाश, झोपड़ी भीतर धोळि,
झोपड़ी फर आग लगाई,
उत्तराखंड की महान वीरांगना,
"जगदेई की कोलिण",
राखु बणिक ऊठ्दा धुवां मा समाई.

सत्-सत् नमन त्वैकु, जगदेई की कोलिण,
तू थै उत्तराखंड की शान,
याद रख्लि जुग-जुग तक,
उत्तराखंड की धरती अर् लोग,
तेरु महान बलिदान.

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
30.7.2009
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