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  • Prabandhak: "शेरदा अनपढ़" जी.. कविवर बौड़िक ऐन..  आखिर! आप कविवर, यीं धरती सी दूर, चलिग्यन, कुजाणि कख, कालजयी, कुमाऊनी कविताओं कू, सृजन करिक, अनंत की ओर.....  हमारा प्रिय स्वर्गवासी, जनकवि "गिर्दा" जी तैं, धरती का हाल बतैन, ऊँका चाण वाळौं की, विरह मा व्यथित, मन की बात बतैन, ह्वै सकु त फिर, "गिर्दा" जी का दगड़ा, नयुं शरीर धारण करिक, उत्तराखंड की धरती मा, कविवर बौड़िक ऐन..
    Today at 02:25:47 PM
  • Prabandhak: प्रख्यात कुमाऊंनी कवि शेर सिंह बिष्ट यानि ’शेरदा अनपढ़’ का रविवार सायं निधन हो गया।  कुछ समय से बीमार चल रहे ७९ वर्षीय शेरदा ने अस्पताल में उपचार के दौरान अन्तिम सांस ली।  तीन अक्टूबर १९३३ को अल्मोड़ा के माल गांव में जन्मे शेरदा वर्तमान में हल्द्वानी की श्याम विहार कॉलोनी मुखानी में रह रहे थे।
    Today at 09:46:48 AM
  • Prabandhak: मान्यवर   बुरांस परिवार की तरफ भटेय सादर सैमन्या अर  सेवा  श्रीमान जी  लोकभाषा (गढ़वली - कुमौनी अर जौनसारी )  की समस्या और समाधान थेय " कौथिग २०१२ " मा  मुंबई का प्रवासी उत्तराखंडी  समाज का बीच एक परिचर्चा का रूप मा ल्याणा की कोशिश मुंबई का बुरांस संगठन कु एक प्रयास ,लोकभाषा का क्षेत्र मा पिछला २५ बरसौं भटेय आंदोलनरत धाद संगठन का  " धाद लोकभाषा एकांश "  की विमर्श श्रंखला  "आखिर कनकै  बचऽलि भाषा " मा हम आप्थेय लोक भाषा प्रेमी और बुद्धिजीवी  का रूप मा आपक वैचारिऽक उपस्थिति का वास्ता  सादर न्यूतणा छौं ,   कार्यक्रम मा आपकू आणु और आप्की भागीदारी थेय बुरांस परिवार अप्डू  सौभाग्य सम्झलू  कार्यक्रम मा आप्की जग्वाल रैली  शुभकामनाओं  दगड आपकू अप्डू गीतेश सिंह नेगी जग्वाल मा :  बुरांस परिवार मुंबई ,धाद लोकभाषा एकांश व कौथिग परिवार मुंबई संपर्क सूत्र : ०८७९१५६११०८,०९६१९००४७९७
    April 23, 2012, 12:44:33 PM
  • Editor Garhwali: Mujib Naithani सेमन्या उत्तराखण्ड..बल ..अगर आपको हाई प्रोफाईल ड्रामा सिखना हो तो कांग्रेस से सीखो ..बल ..केंद्र में आते ही सौ दिन का एजेंडा कई दिन मीडिया में चला ..बल अब तो कई सौ दिन बीत गए पर एजेंडा बल पता नि कख हर्ची गे / वनी एक मंत्री दीदा आते ही हवाई फायर हो गए ये तैयार करो ...वो..बड़ी बड़ी बातें ..बल ..लम्बी लम्बी गप्प ..मुझे स्कूल की दैनिक रिपोर्ट चाहिए ..बल इन लगणु च की मंत्री दीदा पहाड़ी नि छन /बल ..किले...
    April 11, 2012, 02:30:16 PM
  • VINOD GARIYA: "कौ लाटा आण काथा, सुण काला तु , अनाड़िल घट लगाई, दौड़ डुना तु"
    December 26, 2011, 04:29:54 PM
  • Admin: नय्या पीढ़ी आपनी पछाण भुल्या धारा नौला आपना पहाड़ भुल्या  गौं में कि भुल्यु चेलो इसके बतुछ बस द्वी आँखा चार हाड भुल्या  भोट मांगन घर घर डेली उनान सब कॉल करार इन गंज्याढ़ भुल्या  "गुमनाम पिथौरागढ़ी "
    December 25, 2011, 09:49:06 AM
  • Rajesh Joshi: कुमाऊँनी रिस्त... माँ - इजा पापा - बौज्यू भाई - भै बहन - बैणि दादा, नाना - बूबू दादी, नानी - आमा चाचा - कग चाची - काखि ताई - ज्यार्ज पड़ोसी - आमा, बूबू, बोजि या पै नानतिन.. बाकि मैंस तो सब प्लेन्स जै रयीं डबल कमूणे लिजी !
    October 05, 2011, 10:09:20 PM
  • Admin: हुक्का . तमाक , पानी बहुते याद ऊछ नानी रात ठुली कहानी बहुते याद ऊछ  रात्ते,छाकला ,ब्याल जतारान में पीसी रूथी हमारी भूख इजा की परानी बहुते याद ऊछ "गुमनाम "
    August 07, 2011, 04:24:33 PM
  • Rajesh Joshi: बेटे की कहानी बाब की जबानी  आजकल का नोनुं न कमरा माँ लगी देवतो की फोटो पता नि कख फेकली उन फोटो की जगह पर KATRINA की फोटो लगेली. चला मेन सोची में भी देखुलू कण हुंदा इंडर का मेडल ...सिरन्दा तला धरया निर्भागी का दुनिया भर का LOVE LETTER. सब तितरा फतिग्या मेरा पेनो क नि रायु सूरार आर वेते चेणु नयोन क LUX और HAMAM. मेडी वेगी MOM , DAD बाबा. मेंन बोली क्या बुनू मी नी बिन्गाणु मेरु लाटा गीत लगनु एक वू I LOVE YOU, I LOVE YOU में समझी ख़राब होगी होलू डबा हुनो बस्युलू घयु copyright Anju Bartwal ;)
    July 26, 2011, 07:42:57 AM
  • Rajesh Joshi: पहाड़ी ग़ज़ल  जब व्हे खोरि कपास व्हे ग्ये बुडा-बदिन की मजाक व्हे ग्ये  ...ज़माना आग लागो तेरी खोरि ले प्यार ,मुहब्बत ले टाइम पास व्हे ग्ये  देव पित्तर पाथरों ले ढाकी हल्या सारि देवभूमि शराब की दास व्हे ग्ये  बैंड में काँटा लगा इसो चल्यो छोलिया संस्कृति को नास व्हे ग्ये  जब ले जान्छ चेलो परदेश इजा का आँखा चोमास व्हे ग्ये  "गुमनाम पिथोरागढ़ी "
    June 22, 2011, 09:07:18 PM

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Author Topic: गढ़वाली कविता श्री जगमोहन सिंह जयाड़ा (Jigyasu)  (Read 14223 times)  Share 

Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

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  • पर्वतु का छैल मा, गौं मा भै बन्धु का गैल मा,अब 
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"मनख्यौं का बोल"


ज्युकड़ा ऊद, सेळि सी पड़दि,
जू क्वी बोलु, भला बोल,
पर हे मनखी, सुदि नि बोन्नु,
मुख सी बुरा बोल....

कथगा चुभदी बुरी बात,
बोन्न सी पैलि, हे मनखी तू,
अपणा मन मा तोल,
कैकु मन दुखैक,
मन मा होंदु घंघतोळ.....

मनखी मरी मिटि जांदु,
रै जांदा वैका, भला बुरा बोल,
याद करदा छन तब मनखी,
"मनख्यौं का बोल".........
(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" २.१.२०१२)
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित
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Offline जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

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  • पर्वतु का छैल मा, गौं मा भै बन्धु का गैल मा,अब 
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"दरोळु"

जैकु लोग भलु नि बोल्दा,
किलै होलि पिनी?
यनु भी नि सोचदा....
आज दुनिया पेणी छ,
लुकाँ-ढकाँ अर देखाँ,
ब्यो बारात मा,
दिन हो या रात मा,
कै भी शुभ काम मा,
फेर निचंत करिक सेणी छ....
दुख मा दारू, सुख मा दारू,
अनुसरण कन्नु छ,
सभ्य समाज हमारू,
जबकि पैलि लोग,
कतै नि पेंदा था दारू,
तब विकसित नि थौ,
उत्तराखंडी समाज हमारू.....
क्या बोन्न तब,
आज का युग मा,
दारू हिछ सारू,
"दरोळु" त बोल्दु छ,
हौर ल्हवा रे दारू......

(रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
6.1.2012
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हे नेता जी....

फिर एग्यैं तुम,
पांच साल पूरा करिक,
अपणि अर प्यारा चम्चौं की,
पापी पोटगी भरिक,
हम सनै क्या मिलि?
तुम सनै वोट दीक.......

अबरीं दां हम,
तुमारी मीठी बातु मा,
बिल्कुल नि औण्या,
उबरी त बोलि थै बात,
आपन मन भरमौण्या,
कथगा करि आपन,
हमारा गौं मुल्क कू विकास,
पिछला पांच साल मा,
गौं खाली ह्वैगी हमारू,
हम होयां छौं निराश.....

कुछ भि बोला,
भलु न ह्वान तुमारू,
तुम्न खाई हमारू,
हम तुम्तैं वोट द्योला,
कतै न रख्यन सारू,
तुम जूठा, पापी, अबिस्वासी,
दुबारा जीत कू सुपिनु न देखा,
पाप धोण का खातिर,
चलि जवा तुम अब,
हे नेता जी, गया अर काशी...
(रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" )
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित
6.1.2012
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"पहाड़ की पिड़ा"

दूर भागणा छन,
प्यारा पर्वतजन,
पहाड़ सी, कुजाणि किलै?
दुःख दुयौं का मन मा छ,
पहाड़ का भी,
अर पर्वतजन का भी,
आपसी रिश्ता का कारण....

मनखी कू मन बदलि सकदु,
पहाड़ कू कतै ना,
दुःख देणी छन जैकु,
विकास की परियोजना,
जौमा विनाश भी लुक्युं छ,
जू पर्वतजन का खातिर भी,
भलि निछन बल,
नितर किलै भागदा,
पर्वतजन, पहाड़ सी दूर,
क्या देणी छन,
यी परियोजना पर्वतजन तैं,
सिर्फ विस्थापन अर पलायन,
रोजगार कथगा?

पर्वतजन अर पहाड़,
दुयौं कू सतत विकास हो,
अतीत कू रिश्ता कायम रौ,
मन की पीड़ा दूर हो,
कामना छ मेरा कविमन की,
प्यारा "पहाड़ की पिड़ा" दूर हो,
बद्रीविशाल जी की कृपा हो.....

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)
दिनांक: २०.१.२०१२
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« Last Edit: January 24, 2012, 12:24:04 PM by जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" »

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"प्रिय घन्ना भाई"


आंख्यौं सी दूर,
बस्याँ रन्दन,
जू आँखौं मा,
उत्तराखंडी भै बन्धु का,
जौंकु मिजाज, मन मा,
कुतग्याळि लगौण्यां छ,
पर मन मा,
एक टक्क सी लगिं छ,
कना होला अजग्याल,
जीत का जंजाळ मा,
वे प्यारा गढ़वाळ मा,
बसिं होलि जौंका मन मा,
एक ही बात,
हास्य अभिनेता छौं,
हे! नेता बणै देवा,
मैकु जितै देवा,
नेता बणि जौलु,
आपका दुःख दर्द सब्बि,
तुमारा मन की सुपन्याळि,
योजना ल्हेक, साकार करिक,
विकास की जोत जगौलु,
गढ़वाळ कू,
"प्रिय घन्ना भाई".......
रचनाकर: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)
दिनांक: २३.१.२०१२
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"खासपट्टी मा खास"
(Chandrabadni, Tehri)
 
तीन शूरमा, पूर्वमंत्री,
चुनाव अखाड़ा मा छन,
मन मा जीत की आस,
अपणु भाग अजमौण लग्याँ,
हे! जनता तेरी जय हो,
जाण लग्याँ ऊँका पास.....

जनता बोन्नि,
याद ऐगी हमारी,
घर गौं भी ऐगी याद,
आज देखणा छौं,
मुखड़ी तुमारी,
कै बरसु का बाद........

सत्ता कू सुख चाख्यलि,
भूलिग्याँ हमारू उपकार,
अब त ह्वैगे होलु,
आपकी गरीबी कू उद्धार.....

प्रिय प्रत्याशियौं,
हम्न दिनि,
आप सब्ब्यौं तैं मौका,
आज भी घंघतोळ मा छौं,
हम खासपट्टी का गौं का.....

माँ चन्द्रबदनी का दर्शन करा,
रखा मन मा जीत की आस,
टटोळा मन प्रिय जनता कू,
जौंका मन मा विकास की आस,
जू छन "खासपट्टी मा खास".......

(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
१८.१.२०१२

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"ऊँचि निसि डाँडी-काँठी"
 
ऐंसु का ह्युंद ह्यून छयिं छन,
जख जान्दु छ कल्पना मा,
हमारू तुमारु मयाळु मन,
दूर परदेश जू भै बन्ध होला,
होलि याद औणि ऊँ तैं,
उदास भी होला होण लग्यां,
यनु सोचि मन मा,
हे ! हमारा प्यारा पहाड़,
हम्न क्या कन्न.....

प्यारी हिंवाळि डांडी काँठी,
मनमोहक छन हमारा मुल्क,
होलि जख फुंड घुघती प्यारी,
हिटणि ठण्डु मठु सुरक सुरक,
दादा जी कू ह्वक्का कुड़-कुड़,
गौथु की डिग्ची चुल्ला मा,
होलि थिड़कणि थिड़-थिड़,
होलु बोडा कोदा की रोठठी,
घर्या घ्यू का दगड़ा खाणु,
नाती नतणौ कथा सुणौणु,
कथगा स्वाणि होलि लगणि,
"ऊँचि निसि डाँडी-काँठी"....

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)
१६.१.२०१२, www.pahariforum.net

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"प्यारा पहाड़ मा"

अस्पताळ मा डाक्टर,
स्कूल मा बल मास्टर,
निछन-निछन,
कनुकै होलु ईलाज,
कनुकै पढला नौना-नौनी,
कनुकै होलु?
उत्तराखंड कू विकास,
ज्व छ, सबका मन की आस,
करा हे! आप सब्बि विचार,
ये काम का खातिर चैन्दी,
साफ सुथरी सरकार,
पर्वतजन तुम जागा,
अपणा विकास की खोज मा,
भौं कखि न भागा,
रुका-रुका-रुका,
पहाड़ मा....
कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)
दिनांक: २५.१.२०१२
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"नेता बणि जौलु रे"

देख्दु जावा तुम, कुछ दिन की बात छ,
वे प्रभु का हाथ छ,
होलि कृपा जू तुमारी,
नेता बणि जौलु रे-नेता बणि जौलु...

जीती जौलु जब,
झट पट्ट मैं भी, वे प्यारा देरादूण,
विधान सभा मा जौलु रे,
नेता बणि जौलु रे-नेता बणि जौलु...

जीती जौलु जब,
चलि जौलु प्रतिनिधि बणि, पहाड़ सी दूर,
सदानि मन मा ख्याल, तुमारु रलु रे,
नेता बणि जौलु रे-नेता बणि जौलु...

जीती जौलु जब,
पूरा पांच साल, देहरादून रौलु रे,
सच छौं बोंनु, पहाड़ औलु रे,
नेता बणि जौलु रे-नेता बणि जौलु...

जीती जौलु जब,
ये पहाड़ जब आलि, आफत तुम फर,
सच छौं बोंनु, देखण औलु रे,
नेता बणि जौलु रे-नेता बणि जौलु...

जीती जौलु जब,
तुमारी आंख्यौं कू मैं,
तारु बणि जौलु रे, बौड़ी बौड़ी औलु रे,
नेता बणि जौलु रे-नेता बणि जौलु...

तुमारा हाथु कू साथ,
पिठैं अर फूल पात,
याँ सी क्या छ भलि बात,
हे! तब नेता बणि जौलु रे,
तुमारु सेवाकार रौलु रे.....
नेता बणि जौलु रे-नेता बणि जौलु...
कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित २७.१.२०१२)
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हे पहाड़ी
पहाड़ तैं पछाण,
जू हमारू छ पराण,
जै फर हम सनै छ,
भारी अभिमान,
कथगा प्यारू,
दुनिया मा न्यारू,
उत्तराखंड्यौं की शान,
देवभूमि,
जख देवतों का थान,
स्वर्ग का सामान,
जख हैंस्दु छ हिमालय,
प्यारा बुरांश तैं हेरी,
हे पहाड़ी,
ज्व जन्मभूमि छ,
तेरी अर मेरी.
कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
दिनांक: ९.२.२०१२
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)
इ-मेल: j_jayara@yahoo.com
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"मेरा गौं का बैख"
रोजगार की तलाश मा,
बद्री-केदार यात्रा,
धेल्ला पैसा का खातिर,
डंडी-कंडी बोकण गैन,
बल्द भैंसौं का बैपार मा,
माळ नागपुर भी गैन,
पर पहाड़ छोड़िक,
उबरि कतै नि गैन....

नौकरी कन्न गैन,
अंग्रेजु का राज मा,
देश की फौज मा,
विश्व युद्ध मा,
आज़ाद हिंद फौज मा,
जिंदगी का अंतिम दिन,
पहाड़ मा बितैन,
प्रकृति का दगड़ा,
मौज मा रैन......

लाहौर तक भी गैन,
देश विभाजन सी पैलि,
दिल्ली, देरादूण, मसूरी गैन,
रोजगार का खातिर,
पर गौं बौड़़िक,
औन्दा जान्दा रैन....

जब शिक्षित ह्वैक,
देश विदेश तक गैन,
तौन रूप्या खूब कमैन,
शहर की संस्कृति मा,
क्या बोन्न? यना रम्यन,
घौर बौड़ा कम हि ह्वैन,
देखा देखि पहाड़ छोड़िक,
दिल्ली, देरादूण,
कुजाणि कख कख,
प्यारा गौं पहाड़ सी दूर,
बाल बच्चौं समेत,
पलायन कू पाप करिक,
सदानि कू बसिग्यन,
"मेरा गौं का बैख".
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(रचना: स्वरचित एवं प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )
दिनांक: १५.३.२०१२

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"मेरा गौं का बैख"
रोजगार की तलाश मा,
बद्री-केदार यात्रा,
धेल्ला पैसा का खातिर,
डंडी-कंडी बोकण गैन,
बल्द भैंसौं का बैपार मा,
माळ नागपुर भी गैन,
पर पहाड़ छोड़िक,
उबरि कतै नि गैन....

नौकरी कन्न गैन,
अंग्रेजु का राज मा,
देश की फौज मा,
विश्व युद्ध मा,
आज़ाद हिंद फौज मा,
जिंदगी का अंतिम दिन,
पहाड़ मा बितैन,
प्रकृति का दगड़ा,
मौज मा रैन......

लाहौर तक भी गैन,
देश विभाजन सी पैलि,
दिल्ली, देरादूण, मसूरी गैन,
रोजगार का खातिर,
पर गौं बौड़़िक,
औन्दा जान्दा रैन....

जब शिक्षित ह्वैक,
देश विदेश तक गैन,
तौन रूप्या खूब कमैन,
शहर की संस्कृति मा,
क्या बोन्न? यना रम्यन,
घौर बौड़ा कम हि ह्वैन,
देखा देखि पहाड़ छोड़िक,
दिल्ली, देरादूण,
कुजाणि कख कख,
प्यारा गौं पहाड़ सी दूर,
बाल बच्चौं समेत,
पलायन कू पाप करिक,
सदानि कू बसिग्यन,
"मेरा गौं का बैख".
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
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‎"शेरदा अनपढ़" जी..
कविवर बौड़िक ऐन..

आखिर!
आप कविवर,
यीं धरती सी दूर,
चलिग्यन, कुजाणि कख,
कालजयी,
कुमाऊनी कविताओं कू,
सृजन करिक,
अनंत की ओर.....

हमारा प्रिय स्वर्गवासी,
जनकवि "गिर्दा" जी तैं,
धरती का हाल बतैन,
ऊँका चाण वाळौं की,
विरह मा व्यथित,
मन की बात बतैन,
ह्वै सकु त फिर,
"गिर्दा" जी का दगड़ा,
नयुं शरीर धारण करिक,
उत्तराखंड की धरती मा,
कविवर बौड़िक ऐन..



"शेरदा अनपढ़" जी..
कविवर लौटकर आना....

आखिर!
इस धरती से चले गए,
अपने चाहने वालों से दूर,
कालजयी कुमाऊनी कविताओं का,
सृजन करके,
अनंत की ओर,
न जाने कहाँ...
हमारे प्रिय स्वर्गवासी,
जनकवि "गिर्दा" जी को,
धरती के हाल सुनना,
उनके विरह में व्यथित,
चाहने वालों की,
बात भी बताना,
हो सके तो फिर,
"गिर्दा" जी सहित,
नवीन काया धारण करके,
उत्तराखंड की धरती पर,
पुनर्जन्म धारण करके,
कविवर लौटकर आना....
श्रधांजलि-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
२१.५.२०१२

 

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